भाषा / Language
मैंने उसे सर्दियों की धूप की तरह संभाला और उसने मुझे मुट्ठी…
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मैंने उसे सर्दियों की धूप की तरह संभाला और उसने मुझे मुट्ठी भर गीली रेत की तरह
मेरी कविता भी रोज़ उसी जगह से टूटती है जहां से तुम्हारी कहानी जुड़ती है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें