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रचना 2213

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उन आँखों में चाहे मेरे लिए रत्ती भर जगह न थी पर पड़ाव बेहिसा…

उन आँखों में चाहे मेरे लिए रत्ती भर जगह न थी पर पड़ाव बेहिसाब दिखते थे। मुझे रुक जाने से बेहतर लगा रुक रुक कर साथ चलना। फ़िदा हूँ। हमेशा रहूँगी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें