भाषा / Language
इतने बड़े ब्रह्माण्ड में इतनी छोटी सी पृथ्वी है।
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*इतने बड़े ब्रह्माण्ड में इतनी छोटी सी पृथ्वी है।
उस छोटी सी पृथ्वी के तुम कितने बड़े से आदमी हो।
*प्रेम में ठीक कुछ भी नहीं होता ...
बस गलत ठीक होता रहता है।
प्रेमी कुछ नहीं होते।
*अपनी कीमत मुफ़्त रख कर प्रेम
बंटता रहता है...
कोई खरीदता है
कोई मांगता है
कोई बस दूर से ये तमाशा देख कर हँसता है।
मेरा जैसा उस पर कविता लिखता है।
😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें