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किसी रोज़ नज़्म पहननी हो तो चले आना

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किसी रोज़ नज़्म पहननी हो तो चले आना एक मुद्दत से मुझमें लफ़्ज़ों का बाज़ार लगा है रात ने चाँद से कहा ... 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें