कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2127

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मैं तुमसे बोलता नहीं

मैं तुमसे बोलता नहीं मिलता नहीं दिखता नहीं सुनता नहीं हूँ भी कहीं या नहीं ...ये भी पता नहीं क्यूँ आती हो रोज़? क्यूँ पुकारती हो? मैं कौन हूँ ? ईश्वर के बाद वाला ईश्वर ... मैंने उससे कहा *खुद से तो रोज़ ही कहती हूँ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें