भाषा / Language
ल से ....लारे
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ल से ....लारे
मैं तुम तक नहीं आ सकता.....
तो मैं आ जाती हूँ
मैं तुम में समा भी नहीं सकता ...
तो मैं समा जाती हूँ
मैं तुम से कुछ कहूँगा भी नहीं....
तो मैं भी चुप हो जाती हूँ।
मैं तुम्हें खारा कर दूंगा....
और.....मैं तुम्हें खरा
मुझ तक बहुत सी नदियाँ आती हैं
तो ?.... भाती तो नहीं ना?
तुम मुझमें गुम हो जाओगी....
वो तो वैसे भी हूँ
मैं तुम में रह भी नहीं सकता...
मैं रहूँगी ना ....सदा
मैं तुम्हारा हो कैसे पाऊंगा ...
मैं तो वैसे भी ...होकर भी कहाँ हूँ..?
तुम खुद को खो दोगी...
तुम्हें पाकर ही ...ना
मुझमें अंत दिखेगा हमेशा...
अनंत भी तो
तुम लौट नहीं पाओगी...
लौटने के लिए चला कौन है यहाँ
तुम भी कहाँ लौट रहे?
कब से कल्पना को लारे दे रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें