भाषा / Language
डर... * जब पहली बार उससे मिली ...उसी शाम उसने कहा ये ....है…
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डर...
* जब पहली बार उससे मिली ...उसी शाम उसने कहा ये ....हैं।अच्छी कहानियाँ लिखती हैं। जाने क्यों मैंने नहीं देखा उस किसी का चेहरा....मैं तुम्हारी आँखों में तुम्हारा ही कहा झूठ होते हुए देखना चाहती थी। पर तुम सच्चे निकले।काला जादू होता रहा।
*सबसे प्यारा फूल क्यों हुए तुम?
आसपास इतनी सुंदरता ....उफ्फ़
मेरे पास भी खुद को चुपचाप हरा रखने के सिवा क्या चारा रहा । मुस्कुरा लूँ क्या?
* सूरज के आसपास कितने ग्रह चक्कर लगाते हैं ...लुभाते रहें ।
मुझे रोज़ ग्रहण लगता है।
*हम सभी साथ थे ....कभी वो ,कभी वो, कभी वो और कभी वो भी
तुम्हारे बोलों से खुरच खुरच कर कुछ नाम मिटाना सबसे सुंदर चित्रकारी है मेरी।
किसी रोज़ पोट्रेट भेजूंगी तुम्हारा।
*काश तस्वीरें पुख़्ता सबूत न होती ।
जैसे कुछ स्पर्श ...कुछ कहानियाँ
वो तस्वीर मिटा दी और कुछ जुड़े नाम खारिज़ कर दिए । एक गीत के बोल बहुत चुभते हैं उस रोज़ से।
*जिस रोज़ मिलूंगी और घड़ी में समय खत्म होने वाला होगा तो मैं क्या करूँगी?
मेरी हथेली पर अपना नाम लिख दोगे?
*हाँ पर तुम्हारी हाँ रख देने के लिए कितना और प्रेम करूँ ?
कहीं तुम्हारा प्रतिमान बदल न जाए इस बार भी?
*खामोशी की लिपि ही भेज दो...
मैं decode करने में लगी रहूँगी।
गलत गलत
*तीन मनकों से खेल लूँगी सारी चौसर
प्रीत वाला खाना चाहे हो... न हो
ऐसे तुम मिले हो...
ऐसे तुम मिले हो....
कुछ रूमानी डर हैं....आते जाते रहते हैं।पर मैं रुकी रहती हूँ।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें