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रचना 2105

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एक रोज़ उंगलियों के पोरों से खुरचे रंगों ने पूछा

एक रोज़ उंगलियों के पोरों से खुरचे रंगों ने पूछा ... हुसैन क्या तलाशते हो खाली कैनवास पर ? क्या नहीं मिलता? और ....क्या रह जाता है हर बार माँ ढूंढता हूँ और वो हर बार औरत हो जाती है शायद मैं मकबूल होना चाहता हूँ पर देखो ना हर बार फिदा हुआ जाता हूँ। खुरचे रंग शरमाये... उड़े और... हुसैन की दाढ़ी में छिप गए।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें