कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2089

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यारियां

यारियां.... स्कूल की यादों के नाम पर मुझे ससून डॉक मुम्बई का अपना K V no 3 कोलाबा याद आता है जहां शायद में नवी क्लास में आई थी।मेरे पिताजी नेवी में थे तो हर तीन चार साल में बोरिया बिस्तर समेटने में हम लोग माहिर हो चुके थे।ये कितनी बड़ी कला है ये मुझे ज़िन्दगी के बाद के सालों में समझ आता रहा है। कच्चे baracks में स्कूल था ।टीन की छत वाला। एक बड़ा सा शक्तिमान ट्रक भी याद है जिसमें सबसे आगे खड़े होकर हवा से बातें करने की होड़ में कई बार घुटने और कोहनी छिलते थे। आज का दो हाथ फैलाकर टाइटैनिक वाला सुख कई दफ़ा मेरे हिस्से में भी गिरा।ये ट्रक हम सभी की मुफ्त रोज़ वाली ride था... स्कूल से घर घर से स्कूल। टिफ़िन, ट्यूशन ,दोस्ताना और दिल्लगी बस इन चारों में स्कूल सिमट जाता था। पढ़ाई तो होती रहती थी। हम सब नेवी वालों के बच्चे थे तो कोई बड़ा छोटा स्टेटस वाला चक्कर ही नहीं रहा। वही navynagar ... वही सरकारी क्वार्टर ...वही सादगी... वही मौज। मेरे हमेशा से लड़कियां केवल दो तीन पर लड़के ढ़ेर सारे दोस्त होते थे।मेरे पटती ही उनसे थी। स्पर्धा और प्रतिस्पर्धा का फ़र्क़ मुझे इसका बड़ा कारण लगता था। लड़कियां पढ़ने में और क्लास में इम्प्रैशन बनाने के चक्कर में प्रतिस्पर्धा में डूबी रहती वहीं क्लास के लड़कों का पूरा दिन इस बात पर टिका रहता कि आज कौनसी लड़की से बात होगी ।किसके साथ घर लौटना होगा।किसके साथ डेस्क शेयर होगी।किसकी नज़र में कौन बना हुआ है वैगरह वैगरह । हर रोज़ नई स्पर्धा। इस उम्र में हम सब इन टुच्ची बातों में हँस हँस कर पूरा दिन गुज़ार देते थे। हमारा तीन चार लड़कियों और कुछ लड़कों का गैंग था। उसमें से कुछ भाई थे, कुछ बस दोस्त और कुछ गुँजाइशी बाल प्रेमी। ये अलग बात है कि बारहवीं तक किसी में दिल खोलने की हिम्मत नहीं थी ।मुँह चाहे जितना खोल लें आपस में। हम सब इतने घुले मिले रहते थे कि टीचर्स तक अचरज करते।मेरी तो शिकायत भी होती थी कि आपकी लड़की लड़कों से बहुत बात करती है। मुझे याद है ptm में मेरी माँ ने टीचर को तो ये कहा कि मैडम आगे ज़िन्दगी लड़कों में ही गुज़ारनी है। सीखने दो। गलत करेगी तो थपेड़ देना। पर घर आकर जो इमोशनल टच देकर कान उमेठे ... क्या ही बताऊं...चलो छोड़ो। आपसी मदद क्या होती है वो इसी उम्र में सीखी जा सकती है। राज छिपाने और फ़ाश कर देने में हम सभी माहिर थे।ये भी एक नायाब कला ज़िन्दगी भर साथ चिपकी रही दोस्तों के कारण। क्योंकि स्कूल पुराना था तो छोटा सा ग्राउंड याद है ।वहां एक पुराना कम गहरा कुंआ सा था।स्कूल का कबाड़ उसमें ही पड़ता था। मेरे भाई की मेरे क्लास के लड़कों के साथ दोस्ती थी इसका कारण एक रोज़ मेरे दोस्त ने बताया कि जरूर ये तेरा जासूस है। C I D की तरह सब खबर देने वाला माँ को। फुटबॉल खेलते हुए एक रोज़ जासूस ने कुएं में छलांग लगा दी। दोनों टाँगे फ्रैक्चर। हरबिंदर मुझे याद है मेरे दोस्त का नाम ... पीठ पर रख कर उसे ऊपर लाया और उसे अस्पताल ले गया ।दोस्त साथ हों तो डर कम ही लगता है। फिर चाहे कितना भी बड़ा कांड किया हो। फ़ोन तो होते नहीं थे तब ।मां को भी क्या बताती ।प्लास्टर लगवाकर घर ले गयी दोस्तों के साथ ।तब भी माँ ने जो सुनाई दोस्तों के सामने कि क्या ही बताऊं। सारे होने वाले बाल प्रेमी उसी रोज़ टूट गए कि लड़की तो सही है पर माँ तो मार ही डालेगी। घर पर मम्मी ने कभी दोस्ती को gender bais नहीं रखा। लड़का हो या लड़की दोस्त दोस्त ही होता है...यही कहा। पर मेरे डैडी.... उफ्फ़ मैं पढ़ने में ठीक ठाक थी ।sincere भी पर मस्तीखोर भी।गैंग के सभी लड़के मेरी कॉपी कम्पलीट करने का इंतज़ार करते कि कोई दे न दे ये झल्ली तो नोट्स दे देगी। एक रोज़ शाम को रतन और मिलिंद मेरे घर आये। उस रोज़ डैडी का हाफ डे था तो जल्दी ही आगये। उनके आते ही डैड शुरू हो गए.... किसके बेटे हो? कहाँ रहते हो? क्वार्टर नंबर बताओ? क्या नाम है? बड़े होकर क्या बनोगे? इंग्लिश में कितने नंबर आये? maths का पेपर मिला? साइंस में highest किसके आये?तुम लोग रोज़ कॉपी क्यों मांगने आते हो?और कल्पना की ही कॉपी क्यों चाहिए तुम लोगों को? और भी न जाने क्या क्या? मेरे लफूट दोस्त मेरे जैसे .... सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी। मैंने सोचा copy देकर फटाफट कुछ खिला पिला कर दफ़ा करूँ ...कहीं सारी पोल न खोल दें। जूस वाले ट्रांसपेरेंट गिलास में ठंडे चिल्ड पानी के साथ ग्लूकोस biscuit रख दिये। डर के मारे पानी पीते हुए भी दोनों ने एक्सप्रेशन ऐसे दिया जैसे नींबू पानी पी रहे होंगे। दो दो biscuit मुट्ठी में दबाए भाग खड़े हुए। अगले दिन जो मेरी हँसी हुई...जूस के गिलास में पानी कौन पिलाता है बे? अगली बार से तेरे घर में तो नहीं आएंगे ....हिटलर तेरा पापा नंबर पूछता है .... पूरा बॉयोडाटा जैसे हम ही तेरे ऊपर डोरे डाल रे। अंकल घर पर हो तो बाहर लाल रुमाल टांग दिया कर...या फिर ये लिख दिया कर कि अपने रिस्क पर घुसे । कुछ साल पहले मिली और रतन से मिली तो इस बात पर हँसते हँसते आंखों से कितनी दोस्ती बही ...हिसाब न रहा। यादें है ..... आती जाती रहेंगी दोस्तों की तरह। कल फिर लिखूँगी कुछ याद का टुकड़ा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें