भाषा / Language
मानो कहा
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मानो कहा.....
बड़ी सी ज़िन्दगी छोटे छोटे "काश" से बनी होती है। हम अक्सर उसी को अपना "काश" बनाना पसंद करते हैं जो अपनी ज़द में ना हो। मन उसी एक को इसीलिए नहीं पसंद करता कि नायाब सा कुछ हाथ लगा हो .... बस यही की उस some one की presence में अपना खुद का aura दिव्य हो जाता है और उसकी absence में न्यून।
हम अपनी हँसी ....अपनी बहार उसके मुस्कुराने और बरसने से तय करते हैं ।
बुद्धु सा मन है।
स्त्री बहुत सारे "काश" आँचल में बांध लेती है और कुछ एक पैरों में बांध लेती है। पुरुष सारे "काश" मन में सिल लेता है और कुछ एक होंठों के बींचों बीच दबा लेता है।
कटी हुई पतंग और जा चुका प्रेम बहुत कम वापस लौटते हैं। पर ये जो मन है ना ....मन्नतों और मंसूबों का warehouse है। इसलिए न हम भर पाते हैं ना ख़ाली।
ये reserve कर लेने की आदत, उस
किसी को taken for granted लेते चलने की लत...प्रेम हार जाने जैसा है।
तय है उदासी ।
कुछ "काश" अपनी हथेलियों में "आकाश" लिखवाकर नहीं लाते।
सच्ची स्त्री कभी भी कच्चा सौदा नहीं करती और सच्चा पुरुष कभी भी कच्चा हिसाब नहीं रखता।
*पढ़ी हुई किसी कहानी को लिखने की नाकाम कोशिश😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें