कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2074

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छल दो अक्षरों का ऐसा बूमरैंग शब्द है कि जो बार बार लौट कर…

छल दो अक्षरों का ऐसा बूमरैंग शब्द है कि जो बार बार लौट कर घात देता है। हर बार का ज़ख्म पिछली बार से गहरा। स्त्री का सबसे बड़ा भय भी छल ही है... अपनों से छल ।और अगर वो अपना उसके अस्तित्व से ताल्लुक रखता हो तो वो या तो टूट जाती है या फिर टूटने लायक नहीं बचती। ऐसा छल उसे कमज़ोर और मजबूत दोनों उसी पल में बना जाता है। कुछ सँभल कर वो प्रेम में उतरती तो है पर प्रेम के हर छींटे को संशय से देखती है कि ये सिहरन देगा ...कि खरोंच देगा ? अंदर से टूटी स्त्री सबके सामने अटूट होने का ढोंग करते करते खुद को एक वीराने में धकेल आती है जहां न प्रेम होता है न प्रेमी ।होते हैं तो बहुत सारे छोटे- छोटे श्राप जो उस एक बड़े छल के रोज़ होते पैने टुकड़े हैं। वो स्त्री इनमें चलते चलते घायल होती रहती है ताउम्र ... एक अकेली रानी की तरह जिसके आसपास सब कुछ है बस वो खुद नहीं है कहीं । कुछ यूँ दिखी तुम्हारी तीसरी कहानी "छोटे अघोरी का शाप "मेरी नज़र से... कल्पना Sushma Gupta तेरे लिए 💐💐💐 मेरा मन
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें