भाषा / Language
ये क्या हैं
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ये क्या हैं ?
आम
गलत ,ये *मायके के आम* हैं।
बहुत अलग ...बाक़ी सब मिठास से।
अभी कच्चे हैं ...पर जब मीठे होंगे तो इसके जैसे मीठे आम हो नहीं पाएंगे क्योंकि इसमें मेरे डैडी जी का वात्सल्य और माँ की ममता मिली है।उनकी मेरे लिए फ़िक्र और दुलार मिला है।
जब भी घर पर फ़ोन करो डैडी जी यही कहते हैं तेरी याद आ रही। तू इस बार आ नहीं पाई । पेड़ में कितना आम आया है। पर मीठा नहीं हो रहा। मेरी चिड़िया आई नहीं न खाने ।
माँ से जब बात करो तो आम का अचार ,अमचूर,मुरब्बा,
चटनी सब बना कर मेरे लिए धरा है।ये हर बार फ़ोन में कहती है। तू आयी नहीं इस बार। अच्छा नहीं लग रहा।
एक दिन डैडी जी बोले मैं तेरे एकाउंट में पैसे डाल देता हूँ तू एक पेटी आम खरीद कर खा ले ।☺️☺️मैंने कहा डैडी जी आप तो हद ही कर देते हो। बोले बेटा तेरी बहुत याद आती है ।तू आती है तो बहुत कुछ लौट कर आता है।
ऐसा नहीं कि ये चीज़ें यहां दिल्ली में मिलती नहीं पर जो अपना उगा होता है उस को बेटी तक पहुंचाने की दोनों की कसक है ।क्या ही कहूं।
आखिर आज भाई ने अपने दोस्त के हाथ हल्द्वानी से मेरे घर आम पहुंचा ही दिए। बोला... दीदी तेरे लिए आम भेज रहे हैं....जो बहुत ख़ास हैं। इसमें डैडी मम्मी की ज़िद्द भरी है। थोड़े दिन में मीठे होंगे। तू तो आयी नहीं ।मैं आया हूँ तब भी इम्पोर्टेंस तेरे को दे रहे। जब तक तेरे पास ये न पहुंचेंगे इनको चैन नहीं आएगा।☺️☺️☺️
Thank u bhai💐💐💐
मायका आबाद रहे।
*विनोद ने ये कह कर हँसते हुए आम carromboard के ऊपर सज़ा दिए हैं कि खास आम *तुम्हारे मायके *से आएं हैं।
इन्हें ज़मीन पर कैसे रखूँ😊😊😊😊?
उसके बाद की मेरी पैनी नज़र और मंद मुस्कुराहट क्या ही शेयर करूँ ... जाने दीजिए।
आप सब ख़ास खाइए।😊😊😊 सभी सहेलियां मायके को याद कीजिये।
Love u all💐💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें