भाषा / Language
तुम मेरे लिए घर से हो
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तुम मेरे लिए घर से हो...
जो हर हाल में सुंदर ही रहता है।
पहुँचने- लौटने के सारे रास्ते तुम तक जाते हैं।
चाहूँ ...न चाहूँ।
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जितना रोकोगे मेरा उफ़ान और बढ़ेगा...
तुमने नदी से प्रेम ही क्यों किया?
या तुमने गलत नदी चुन ली।
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खुद का प्रेमी बना रहना एक बेहद अकेला और जटिल काम है ।अंधेरे को पोंछना, धकेलना या छिपा देना।
दिक्कत तो है ... पर मुश्किल नहीं है।
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अक्सर आईने के सामने खड़ी होकर पूछती हूँ ...
कैसे दिख रहे हो तुम मुझमें ?
आईना भी तुम्हारी ही तरह मुस्कुरा देता है बस....
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जब वो मन भिगोता है ना ....
बारिश नहीं होती ....
बारिश होती जाती है....
अगले कई दिनों तक
मेरे चेहरे पर
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तुम पर अटके नहीं हैं ....
अटक गए हैं...
शुक्रिया💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें