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रचना 2057

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तुम मेरे लिए घर से हो

तुम मेरे लिए घर से हो... जो हर हाल में सुंदर ही रहता है। पहुँचने- लौटने के सारे रास्ते तुम तक जाते हैं। चाहूँ ...न चाहूँ। *** जितना रोकोगे मेरा उफ़ान और बढ़ेगा... तुमने नदी से प्रेम ही क्यों किया? या तुमने गलत नदी चुन ली। *** खुद का प्रेमी बना रहना एक बेहद अकेला और जटिल काम है ।अंधेरे को पोंछना, धकेलना या छिपा देना। दिक्कत तो है ... पर मुश्किल नहीं है। *** अक्सर आईने के सामने खड़ी होकर पूछती हूँ ... कैसे दिख रहे हो तुम मुझमें ? आईना भी तुम्हारी ही तरह मुस्कुरा देता है बस.... *** जब वो मन भिगोता है ना .... बारिश नहीं होती .... बारिश होती जाती है.... अगले कई दिनों तक मेरे चेहरे पर *** तुम पर अटके नहीं हैं .... अटक गए हैं... शुक्रिया💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें