भाषा / Language
पहले दांव पर आखरी सी मात हूँ
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पहले दांव पर आखरी सी मात हूँ
ठक्क से जो लगे बस वही बात हूँ
अंधेरा मुड़ते ही फिर इक रात दिखे
बुरे वक्त पर उदासी वाली घात हूँ
इन्तेज़ारी से बस खाली सी हो गई
टूटी ग़ज़ल पर औंधी पड़ी दवात हूँ
पीटी थाली,फिर दीए भी जलाए
मैं कॅरोना डराने वाली जमात हूँ
पड़ोसी पड़ोसी का ही सर काट रहा
तब पेट अब कि मुंह पे पड़ी लात हूँ।
पर्दे से झाँक कर अपनी बात रखे
हक़ से यूँ हया बंधी इक हयात हूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें