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रचना 2013

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इक साथ दो - दो अस्तित्व

इक साथ दो - दो अस्तित्व जीने का हुनर सिर्फ मेरा ही हो सकता है ..... इक "मेरा"..... जमीर सा करीब "मैं " नाम का अस्तित्व इक "सबका".... लकीर सा नसीब "तुम " नाम का अस्तित्व दिन के पहले प्रहर से रात के आखिरी लम्हे तक मैं .... न जाने कितनी बार दोनों अस्तित्वों को बदल बदल के पहनती हूँ बिना थके कभी ख़ुशी से पहन के कभी ख़ुशी के लिए उतार के "मैं" अस्तित्व जब जब "तुम" अस्तित्व पर चढ़ता है मैं नाचने लगती हूँ इक इशारे पर ......अपनी धुनकी में.... नाचती तो "तुम" अस्तित्व की चुनर पहन कर भी हूँ , बस .....इशारे और धुन मेरे से नहीं होते मैं तो तब भी....मैं ही रहती हूँ पर अस्तित्व जब पाली बदलता है तो नूर बदलता है ... इन्द्रधनुष सा नहीं गिरगिट सा ......चुटकियों में अब आदत हो गयी है .... अदला बदली की मुस्कुराने की ...... नाचने की ....... जीतने की...... रोज़ ......मुकम्मल होने की चाहे ......किश्तों में ही सही
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें