कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2005

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उस रोज़ हम अकेले जैसे अकेले थे ।

उस रोज़ हम अकेले जैसे अकेले थे । यानि ...? अपार भीड़ उसमें संग कुछ दोस्त उसमें संग हम उसमें वो उसमें मैं हमारे बीच बस बोलती आँखें हुए ना ...अकेले जैसे अकेले। *तस्वीर भव्या ने भेजी है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें