भाषा / Language
मैं इस लिए भी उदास नहीं दिखती कि लौटने का हुनर रखती हूँ
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मैं इस लिए भी उदास नहीं दिखती कि लौटने का हुनर रखती हूँ ...
आसान नहीं है ...
हर बार उदासी के घुटनों पर सर रख कर रो देना और उस नमी को निचोड़कर वहीं टांक आना।
ये इसलिए भी होता है कि उदासी तक वाले रास्ते में मैं अपनी मुस्कान छोड़ती हुई जाती हूँ कि रास्ता marked रहे। मैं लौट सकूँ।
कुछ देर उदासी का जी बहलाने के बाद वापसी वाले रास्ते से इन्हीं जानबूझकर गिराई हुई मुस्कानों को फिर उठाती जाती हूँ और finishing line पर हँसती हुई ही पहुंचती हूँ।
लोगों को आदत है मेरा हँसता हुआ चेहरा देखने की ।
और ...मुझे लत है उदासी को हराने की।
हम दोनों अपना अपना काम कर रहे....
कमतर कोई नहीं..
न मैं ....न वो
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें