कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1982

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सुनोगे तो ....हँसते दुःख लगेंगे

सुनोगे तो ....हँसते दुःख लगेंगे बटोरोगे तो ....दाद और ताली पलटोगे तो... याद खाली खाली वो सब जो लिख देते हो तुम कविता के नाम पर सिलसिलेवार शुक्र है ....कविता के अपने सुख हैं और सीमाएं भी। "कविवर" सब हो सकते हैं.... "वर्णमाला कल्पना वाली".... तो बस कविता के गले मे पड़ेगी मुस्कुराइए ... शब्द देख रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें