कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1977

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आज सुबह जब अलमारी खोली तो होले से आवाज़ आई ...कल्पना देख रहे…

आज सुबह जब अलमारी खोली तो होले से आवाज़ आई ...कल्पना देख रहे हैं ...आज कल तुम बदल गयी हो । नज़र उठाकर हमारी तरफ देख भी नहीं रही।किस पर फ़िदा रहती हो हम सब जान रहे हैं....ऐसा तो मत करो यार ! कभी तो नज़र मिलाओ ।मेरे करीब आओ। मेरा नंबर कब आएगा? मैं मुस्कुराई और चुप चाप ये सूट निकाल कर पहन लिया। बस ...अलमारी में अब खुसुर पुसुर शुरू थी। साड़ियां और जीन्स आपस में फुसफुसा रहे थे.... ठीक ठाक ही लगरी। इतनी भी अच्छी नहीं लगरी । हाँ नहीं तो! ☺️☺️☺️ * फोटू लेते हुए दक्ष कह रहा....मां चाची के घर ही जा रहे ।शादी में नहीं😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें