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रचना 1957

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रोज़ इक तारा तोड़ती हूँ कि ये चाँद अकेला हो जाये

रोज़ इक तारा तोड़ती हूँ कि ये चाँद अकेला हो जाये कमबख्त रोज़ इक ग़ज़ल लिखता है कि मेला हो जाये आज दिल शायराना... शायराना.... शायराना लगता है।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें