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रचना 1927

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एक पत्थर से कब तक प्रेम कर सकती थी लड़की

एक पत्थर से कब तक प्रेम कर सकती थी लड़की... फिर एक रोज़ वो काठ हो गयी। पत्थर उसके हद अबोले पन से विचलित हो गया पर पत्थर था ....बोला नहीं और रोज़ रोज़ उस काठ की लड़की के पास लुढ़क कर बैठने लगा।उसके अबोले स्पर्श से काठ की लड़की धीरे धीरे फिर बदलने लगी। पत्थर भी उसकी संगत में मोम होने लगा। धीरे धीरे दोनों एक दूसरे के लिए कठपुतली हो गए। दुनिया में ऐसा क्या कुछ है जो हो नहीं सकता? गर तुम चाहो तो। मोह के धागे क्या कुछ नहीं कर सकते।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें