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रचना 1914

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समन्दर भर के शब्द लायी थी तुम्हारे लिए

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समन्दर भर के शब्द लायी थी तुम्हारे लिए और तुम हो कि इक निगाह में सोख लिए .... अब ऐसा भी क्या "अजनबी" होना ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें