भाषा / Language
घोर उदासियों के इस दौर में
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घोर उदासियों के इस दौर में
हमें उससे भी घोर उदासियाँ
देखने और सुनने की आदत होने लगी है
ये रुका नहीं तो
हमें उदास आंखें इज़ाद करनी होंगी
और पारा पड़े कान भी
इससे भी उदास मंज़र लिखने पड़ेंगे
जाने कितने ?
जाने क्यूँ ?
क्या हम तैयार हैं ?
और हमारी कलम?
घोर उदासियाँ हमें खुरच रहीं हैं।
रोज़ रोज़
धीरे धीरे
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें