कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1896

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इतने सारे शब्द बिखरे पड़े थे पर जो कहना चाह रही थी बस वही हर…

इतने सारे शब्द बिखरे पड़े थे पर जो कहना चाह रही थी बस वही हरसिंगार चुन नहीं पाई.... काश तुम मेरा हथेली भर दुःख देख सकते।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें