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रचना 1869

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मैं दिन कमा कर उसे सौंप देता हूँ

मैं दिन कमा कर उसे सौंप देता हूँ...... वो रात खर्च कर मुझे रोप देती है..... हमारा चाँद कभी टूटता ही नहीं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें