कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
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रचना 1846

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मैं बातों की गुल्लक थी

मैं बातों की गुल्लक थी ..... और वो किताबों का जखीरा.... हम अपने बीच शब्द बोते तो देते थे पर प्रेम काट देते थे। फिर उस रोज होली पर जाने क्यों हम दोनों ने शब्दों को निचोड़ कर तरल कर दिया। शब्दों का घोल कुछ उसने मेरी हथेलियों में मला और कुछ मेरे गालों पर रच दिया। रंगत लिखी नहीं जा सकती सिर्फ महसूस की जाती है। उस शाम उसके सफेद कुरते पर मेरी हथेलियों की छाप और गालों की रंगत दोनों छप गई। कोई मुस्कुराते हुए इतना दिलकश पहली बार दिखा। मेरी गुल्लक ख़ाली हो गई । उसकी किताबों से अक्षर उड़ गए। हमने लीप लिए प्रेम वाले मुट्ठी भर रंग खुद पर
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें