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रचना 1839

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तुम्हें ज़रा ज़रा रोज़ रोज़ भूलकर बहुत सारा इक जगह इकट्ठा किया…

तुम्हें ज़रा ज़रा रोज़ रोज़ भूलकर बहुत सारा इक जगह इकट्ठा किया है । आज उसी जगह कुछ फूल खिले हैं । कैक्टस मायूस नहीं करते अब । शायद मेरी ज़िद्द ने उन्हें कम कंटीला ज्यादा रंगीला होना सिखा दिया है। तुम बोलो ..... मेरे हिस्से वाला भुलावा तुमने कहाँ रोपा?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें