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रचना 1818

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कितना कम बोलते हैं ये पहाड़.... इनकी चुप सीखने का मन है।

कितना कम बोलते हैं ये पहाड़.... इनकी चुप सीखने का मन है। जी में तो ये भी आता है कि इनकी चुप का तुम्हारी चुप्पी से मिलान करके देखूँ ... कौन दिलबर है ? और कौन बस दिल भर ? आज अल्मोड़ा का सफ़ेद बसंत😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें