कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1800

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मन

मन...... महज़ चार खानों वाले , नहीं रह गए हो तुम सौ सुराख कर लिए हैं ,खुद पर तुमने सादे नहीं रह गए हो "मन" शातिर भी नहीं , शायद "हुनरबाज़" कहना सही होगा ख्वाब ,सपने ,ख्वाइशें, चाहत ,पसंद ऐसी - ऐसी लतों की छटपटाहट महसूस करते हो जीते हो और यकायक कैसे कुछ ही पलों में आंसुओं के नल खोल कर सब बहा जाते हो इन सुराखों से किस शिद्दत से , कितनी मुहब्बत से , उन शिकवों,यादों ,इल्ज़ामों और अपेक्षाओं को गले लगाकर पास बैठाते हो आँखों में आँखें डालते हो और फिर किस खूबी से मंद मंद मुस्कुराते हुए नीचे धकेल आते हो इन सुराखों से हैरान रह जाती हूँ , जब ख़ुशी,तरक्की,सुकून ,प्रशंसा,मुहब्बत नए नए भड़काऊ लिबास पहन आगोश में चले आते हैं और तुम इक नज़र उठाकर गिरा देते हो मुंह तक नहीं लगाते शायद डरते हो कहीं दिल न लगा बैठो ना रीझता देख ये बलाएं खुद बखुद फिसल जाती हैं इन सुराखों से तुम्हारी जिस अदा पे मैं लट्टू हूँ वो की ...जब तुम "बुत" बन जाते हो आज़माइशें ,शिकस्त ,मायूसी ,कोफ़्त , उलझन जैसी हूर परियां चली आती है तुम्हारे शहर का जायज़ा लेने तुम्हारी कुव्वत चखने और तुम बस खड़े हो जाते हो सब से भिड़ने के लिए दीवानगी छा जाती है तुम पर जूनून रिसता है इन सुराखों से वाकई "माहिर" खिलाड़ी हो गए हो तुम "मन" इस शह मात के खेल में ज़िन्दगी की बिसात में "मन " तुम तो बहुत तेज़ हो गए हो इस रफ़्तार में इस वक़्त की बयार में
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें