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रचना 1787

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खुद को सहेज सकूं ज़्यादा

खुद को सहेज सकूं ज़्यादा .... तुम से बंट सकूं ज्यादा ..... इक वक़्त ही है जिसे ये कहना अच्छा लगता है ....मुझमें गुज़रते रहे साल भर फिर भी रुके रहे तुम मुझमें .... चले आइये..... इंतज़ार बरस भर का है। कुछ वादे खुद से और किये । कुछ उदासियाँ बहा दी और कुछ जीने के लिए रख छोड़ी हैं। आप सब का साथ बना रहे 😊😊😊😊 नया साल मुबारक रहे। चाहनायें बनी रहें.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें