कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1781

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मैं उससे बंधी हूँ ... पर वो मुझसे मुक्त है।

मैं उससे बंधी हूँ ... पर वो मुझसे मुक्त है। कुछ कीलें चुभती नहीं पर टेक जरूर देती हैं। निर्मोही ! तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार रहेगा। प्रेम तुम्हारे हिस्से में भी कम ही रहे। खर्च न हो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें