कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1780

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अब तो

अब तो .... बेहद सहज तरीके से लपेट के रख लेती हूँ मैं .... अपनी आकांक्षाएं इच्छाएं अभिलाषाएं क्यूंकि ..... आदत बना ली है कल्पना की उड़ान .....भरने की अपने से अपनी ही ....कहने की हर हाल में बस खुश .....रहने की अपना क्षितिज ..... खुद तय करने की अपना धनुक...... अपने शब्दों से रंगने की अपनी शब्द गंगा अपने हिसाब से मोड़ने की अपनी अभिव्यक्ति अपने से सागर में उड़ेलने की
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें