रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद और .... उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ l
रचना 17606 नवंबर 2019भाषा / Languageहिन्दीEnglishरोज़.... इस रात को निगलता है चाँद✦रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद और .... उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ lकल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें