कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 1760

भाषा / Language

रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद

रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद और .... उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ l
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें