कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1752

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चरागों की लौ नम हो रही

चरागों की लौ नम हो रही कुछ शोर भी थमने लगा एक जश्न संग मनाया हमने अब जहाँ सोने चला कुछ चिराग उम्मीद के कुछ संतुष्टि के कुछ वादों के कुछ इरादों के कुछ आशीष के कुछ प्रेम के अब तलक सबकी देली में टिमटिमा रहे मुस्कुरा रहे शायद .... अगली दीपावली तक ऐसे ही मिले झिलमिलाते हुए रिश्ते निभाते हुए पर न जाने क्यों मन फिर भी व्यथित है इस त्यौहार के जाने से
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें