कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1750

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सेतु

सेतु..... हम कभी मिल न सके ... हम कभी जुदा भी न हो सके ..... हमारे बीच हाड़ माँस से बने कई शहर और मिट्टी गारे से बने कई लोग सेतु रहे। एक रोज़ छोटी सी मुलाक़ात तय हुई और हमने अपनी आँखें बदल ली।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें