कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1740

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बाज़दफा

बाज़दफा ...... दिल करता है कुछ नया करने को अपने लिए कुछ रचने को आज फिर दिल किया ....... उठा लायी बीते पलों की मिटटी धर दी "कल्पना की चाक" पर लगी कुछ गढ़ने चाख आगे धकेला खुद पीछे लुढक गयी मुस्कुराई ....... लजाई ...... अपने से कुछ बुदबुदाई फिर रीता किया खुद को और ..... उभार लिया सोंधी सी खुश्बू वाला .... मेरे लिए जिद्दी आँखों वाला ...... अब तलक मेरा नाम लेने वाला ...... इक चेहरा और फिर जैसे..... शून्य हो गयी इक बार फिर ..... हार गयी हूँ असमर्थ हूँ कुछ नया रचने को ..... सिलसिला यही है बरसों से कुछ नया रच ही नहीं सकती शायद मैं सोच में पड जाती हूँ ....... बाज़दफा......
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें