कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1738

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दो कदम बढ़ा कर आ तो गए हो मेरे पास

दो कदम बढ़ा कर आ तो गए हो मेरे पास बोलो ....क्या तलाश रहे हो मुझमें इक किरदार या बस अक्स इक सच या बस मिथ्या इक उम्र या बस पल इक समर या बस भंवर इक प्रीत या बस मीत इक क्षितीज या बस मरीचिका सब बन सकती हूँ .... सिर्फ तुम्हारे लिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें