कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1718

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जैसे सुख से भरा सकोरा नहीं होता ठीक वैसे ही दुःख से भरी छलन…

जैसे सुख से भरा सकोरा नहीं होता ठीक वैसे ही दुःख से भरी छलनी भी नहीं होती। रिसता ... छलकता ही है सब "भरा "... दो अक्षरों की बेहद ख़ाली एक आभास देती हुई ध्वनि भर है। खन्न - खन्न ...खन्न - खन्न टिप ....टिप
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें