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रचना 1713

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आज फिर ख्वाब में भी ख्वाब बुनकर देखते हैं

आज फिर ख्वाब में भी ख्वाब बुनकर देखते हैं ... चलो आज इक बार फिर तुम्हें चुनकर देखते हैं |
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें