कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1709

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अभी भव्या की यूनिवर्सिटी आई हूँ।वो lecture अटेंड कर रही और…

अभी भव्या की यूनिवर्सिटी आई हूँ।वो lecture अटेंड कर रही और मैं महसूस कर रही कि इस शांत और खुले माहौल में लोग कितना कुछ नया सोचने का प्रयास कर रहे। सब अपने अपने में व्यस्त।लैपटॉप या फ़ोन पर जैसे बस घुसे हुए। एक अदृश्य अनुशासन है यहां सब में... इतने बड़े प्रांगण में कितनी प्रतिभाएं ,कितने देश, कितने व्यक्तित्व ,कितने इंसान उग रहे ...अद्धभुत नज़ारा। आज करीब 25 साल बाद किसी university में आना हुआ ...वो भी विदेशी यूनिवर्सिटी हमेशा भव्या से कहती हूँ ...अपने ख़्वाब हमेशा ऊँचे ही देखने चाहिए और वो भी अकेले । खुश हूँ ...कि उसके ख़्वाब आज कुछ पल मैंने भी जिये । बेटी अगर माँ को वर्तमान से भविष्य दिखाने ले जाये तो फ़ख्र जायज है। माँ😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें