कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1673

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कुछ रिश्तों से हम अक्सर नहीं मिलते पर उनसे बोलते रोज़ हैं...…

कुछ रिश्तों से हम अक्सर नहीं मिलते पर उनसे बोलते रोज़ हैं..... ये ज़ेहनी रिश्ते हमारी चाहनाओं के रेशे से बनते हैं। इनमें रेशम सी गठानें होती हैं। ढील दो तो ही खुलती हैं ।कस दो तो बस मस्सा उभर जाए बदसूरत सा ....इस मन पर। औरत चाहना का पहला ....फिर दूसरा ....कभी तीसरा और कभी चौथा और फिर इसी तरह आखरी नाम भी है। एक बार में दिल के चार चैम्बर्स में एक साथ चार चाहनाएँ अलग अलग कैद कर के मुस्कुरा सकती है औरत। चार में से तीन desires का स्त्रोत उसके आसपास की जरूरतों से बना होता है और उसी को समर्पित हो जाता है। सिर्फ़ एक चाहना उसकी अपनी देह से निकलती है जो जन्म से ही गूंगी बहरी होने का ढोंग करती है पर अपनी आंखें प्रेम से लीप कर रखती हैं। ये आंखें खुदगर्ज़ तलाश होती हैं और दुनिया का सबसे दिलकश इंसान अपने लिए चुनती हैं। इकतरफ़ा आभास नशे से भी ज्यादा नशीला होता है। आप मद में आंखें बंद करना सीख जाते हो और दिलकश इंसान हर बार आपको आता हुआ ही दिखाई पड़ता है। जबकि वो एक mirage से बना जादूगर है जो छलना नहीं जानता पर छलनी कर देने में माहिर है। एक तरफ़ा कुछ पहुंचा है कभी ?....न प्रेम ,न रास्ता, न आवाज़ , न छुअन चाहनाएँ अगर शक्ल न पाएं तो उदासी लाती हैं। ज्यादातर औरत के मन का चौथा chamber उदासी से भरा होता है जिसे वो समय समय पर ख़ाली कर के नया शख्स भर देती है..... इसीलिए ज़िंदा लगती है । कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें