कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1664

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ज़ाहिर है ..... सबके हो

ज़ाहिर है ..... सबके हो कम में हम भी मानते नहीं.... देखना एक दिन चाँद तुझे मुट्ठी में जकड़कर कहूंगी जरूर
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें