कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1663

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मन के धागे एक रोज़ पीठ पर खुल गए ।तिल कब ज़ख्म हुआ .....कौन ज…

मन के धागे एक रोज़ पीठ पर खुल गए ।तिल कब ज़ख्म हुआ .....कौन जाने। फिर एक रोज़ शहज़ादी ने दुःख आँख और होंठ से पोंछ कर अपने पैरों में डाल लिए । अब वो खुद की शहज़ादा थी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें