भाषा / Language
निपट अंधेरा जमा था
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निपट अंधेरा जमा था
हाथ बढ़ा कर छुआ तो उदासियों से हाथ सन गया
सूंघ कर देखा तो प्रेम था
गुलदान में पंखुड़ी वाला अंधेरा सूखी पत्तियों पर खिल रहा था
और मैं हाथों में लकीर ढूंढ रही थी
दगा ही तो देनी थी .....
मैंने उसे फिर "चाँद" कहा
उसने इस बार भी कहा....."तुम"
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें