भाषा / Language
सिंड्रेला
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सिंड्रेला.....
चाहे स्त्री हो या पुरुष हर कोई खुद में एक "सिंड्रेला " संजोये रखता है जो गहरी रात होने पर रोज़ परिवर्तित हो जाती है उस सच में जो हम सही मायने में खुद के लिए चाहते हैं।
खुद से रूबरू हुए उस पल में हम सब के अंदर की सिंड्रेला अपने लिए कुछ खोजती है। सिंड्रेला फिर इंतज़ार नहीं करती .....बस बदल जाती है। अपने लिए कुछ पल सांस लेती इस सिंड्रेला से खूबसूरत उस वक़्त सिर्फ खुदा होता है।उस पल आप सच्चे होते हो खुद से।
कुछ पल के लिए सिंड्रेला हो जाएं.......रोज़
ध्यान रहे सिंड्रेला ने कभी सुंदरता नहीं मांगी थी .... आज़ादी चाही थी। सच करना चाहा था अपना मन।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें