भाषा / Language
खाली हाथ शाम को लौटाना अच्छा नहीं लगता
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खाली हाथ शाम को लौटाना अच्छा नहीं लगता
कुछ मोगरे भेजे हैं ...
तस्सली की महक वाले...
सुकून.....
देखने में तुम सा और लिखने में मेरी कविता सा है l
सुनो !
याद रखना मैं कल्पना हूँ...
इश्क़ की तरह रख कर भूल ना जाना...
समन्दर से खोना नहीं...... होना सीख रही हूँ
रुके रहो मुझमें ....
ये होते होते होते ही रह जाना या फिर होते होते बस रह जाना
एक किस्म का तिलिस्म ही है .... नहीं क्या?
लो चुप हो गए ....
अब तो जी भर सुनो मुझ को
कल्पना💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें