कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1524

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और फिर एक रोज़ वो सारे ख़त पत्थर हो गए ......रूठकर मनाने वाले…

और फिर एक रोज़ वो सारे ख़त पत्थर हो गए ......रूठकर मनाने वाले भी और मान कर रूठने वाले भी।खामोशी बस खिसकती ही नहीं। हां ....बह जरूर जाती है ....इन पत्थरों के मांनिन्द ।ख़त अब तलक तो बुत हो चुके होंगे.... सदियों से बिना बोले हुए । कल्पना 💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें