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रचना 1507

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अपने दुख उगाने बुझाने का सारा हुनर मुझमें है ये मान के चलने…

अपने दुख उगाने बुझाने का सारा हुनर मुझमें है ये मान के चलने लगी हूँ ।चाहत से ज्यादा "चाह कर छोड़ देना" भी ज़िन्दगी को सुकून देता है । गज़ब वाला 😊😊 चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों ..... इतना सा ही तो कहना है जिंदगी तुमसे। सेमल में अटका हुआ चाँद
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें