कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 1488

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हमारे आस पास उदासियों का रंगीन कारोबार है। हमें पसंद हैं दु…

हमारे आस पास उदासियों का रंगीन कारोबार है। हमें पसंद हैं दुख जो चाहनाओं के ठीक नीचे वाली परत पर चिपके हैं । चंदेरी वर्क खुद पर मलने की ज़िद्द हमें उन उदास कन्दराओं की और इशारे से बुलाती है। हम नासमझ नहीं हैं पर बुद्धधु हैं। हम वही उदासियाँ खुद के लिए चुनते जाते हैं जो हमारे नाम की नहीं होती.....या फिर ठीक हमारे जैसी नहीं होती। फिर एक रोज़ सब पहन लेने के बाद सब सूख जाता है और हम अपने होठों पर मुस्कान मल लेते हैं। आस पास बैठी वजह भी जाने क्यों बेवजह बन जाती है। अजनबी चेहरे ... अजनबी शब्द... जाने क्या क्या कौन कौन अजनबी दरमियां... लफ़्ज़ ग़ुम करने से क्या होगा ? बोल लो... प्रेम सूख जाए तो भी चंदन ही रहेगा .... तुम कब समझोगे? उदासी सूख जाए तो भी कहानी ही रहेगी। "श " से अगर शब्द होंगे ...तो "क" से कल्पना भी होगी हर बार जाने क्यूँ? बस यूँ ही...... मेरी मर्ज़ी 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें