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रचना 1485

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कभी देखा है

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कभी देखा है ... कविता को वाह वाह सुनते हुए ? वो तो बस कहकर गुजर जाती है जैसे हवा में बनी कोई पेंटिंग या फिर ....पानी से बनी कोई आकृति कविता बस पन्ना पलटना जानती है इस छत से .... दूसरी कविता की छत पर छलांग लगाती हुई बाद का कोई भी मलबा नहीं ढोती तारीफों .....तारीखों का मोह नहीं रखती कविता ऐसी..... निर्मोही कविता इसलिए बची रहती है अंत तक लिखी जाती है अनंत तक दास्तानें तुम लिखते हो बातें भी तुम गढ़ते हो कविता तो बहरी है बस .....वो गूंगी नहीं है कविता आत्म है आत्ममुग्धा नहीं है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें